कुछ ही दिनों में चार बार बढ़े दाम
तेल कंपनियों ने मई महीने में चार बार पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि की है।
- 15 मई को पेट्रोल और डीजल के दाम में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई।
- 19 मई को करीब 90 पैसे प्रति लीटर का इजाफा किया गया।
- 23 मई को पेट्रोल 87 पैसे और डीजल 91 पैसे महंगा हुआ।
- 25 मई को पेट्रोल 2.61 रुपये और डीजल 2.71 रुपये प्रति लीटर बढ़ा दिया गया।
इन बढ़ोतरी के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कुल मिलाकर करीब 7.5 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि हो चुकी है।
10 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ सकते हैं दाम
CRISIL की रिपोर्ट के मुताबिक तेल विपणन कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ी लागत और पुराने घाटे की भरपाई कर रही हैं। एजेंसी का अनुमान है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें मौजूदा स्तर पर बनी रहती हैं, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कुल बढ़ोतरी 10 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा बढ़ोतरी से खुदरा महंगाई दर (CPI) पर लगभग 36 बेसिस पॉइंट का असर पड़ सकता है। वहीं यदि ईंधन की कीमतों में 10 रुपये तक की वृद्धि होती है, तो यह प्रभाव बढ़कर 48 बेसिस पॉइंट तक पहुंच सकता है।
परिवहन और लॉजिस्टिक्स पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर
भारत में अधिकांश माल ढुलाई सड़क मार्ग से होती है। अनुमान के मुताबिक करीब 71 प्रतिशत माल परिवहन ट्रकों और अन्य वाहनों के जरिए किया जाता है। ऐसे में डीजल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ना तय माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इसका असर रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं पर सबसे पहले दिखाई देगा। दूध, दही, फल, सब्जियां, दालें, मसाले, चाय, कॉफी, अंडे, मांस और मछली जैसे उत्पादों की कीमतें बढ़ सकती हैं, क्योंकि इनकी आपूर्ति बड़े पैमाने पर परिवहन पर निर्भर रहती है।
कोर महंगाई भी बढ़ा सकती है चिंता
ईंधन की बढ़ती कीमतें केवल खाद्य पदार्थों तक सीमित नहीं रहेंगी। कच्चे तेल और गैस की लागत बढ़ने से कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स, सीमेंट, लकड़ी और सिरेमिक उद्योगों की उत्पादन लागत भी प्रभावित हो सकती है।
ऐसी स्थिति में कंपनियां उत्पादों की कीमतें बढ़ाने के साथ-साथ ‘श्रिंकफ्लेशन’ का रास्ता भी अपना सकती हैं। इसका मतलब है कि उत्पाद की कीमत वही रखी जाए, लेकिन उसकी मात्रा या पैक का आकार कम कर दिया जाए।
कच्चे तेल की कीमत बनी बड़ी चिंता
CRISIL के अनुसार चालू वित्त वर्ष के शुरुआती महीनों में कच्चे तेल की औसत कीमत लगभग 112 डॉलर प्रति बैरल रही है, जबकि अनुमानित कीमत 95 डॉलर प्रति बैरल थी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार बनी हुई ऊंची कीमतें भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए चिंता का विषय हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक परिस्थितियों में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले महीनों में ईंधन और महंगाई दोनों मोर्चों पर आम लोगों को अतिरिक्त दबाव झेलना पड़ सकता है।









