नई दिल्ली। देशभर के सीबीएसई स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों और अभिभावकों के लिए अहम बदलाव की खबर है। Central Board of Secondary Education (CBSE) ने 2026-27 शैक्षणिक सत्र से कक्षा 6 से नई भाषा नीति लागू करने का फैसला किया है। इस नई व्यवस्था के तहत छात्रों को कक्षा 6 से तीन भाषाएं पढ़नी अनिवार्य होंगी।
यह निर्णय National Education Policy 2020 और National Curriculum Framework for School Education 2023 की सिफारिशों के आधार पर लिया गया है।
क्या है नई व्यवस्था?
नई नीति के अनुसार, कक्षा 6 से छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें से कम से कम दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य होंगी। तीसरी भाषा के रूप में अंग्रेजी को विदेशी भाषा की श्रेणी में रखा जाएगा। यानी अंग्रेजी अब पहले की तरह मुख्य भाषा नहीं मानी जाएगी।
अगर कोई स्कूल फ्रेंच, जर्मन या अन्य विदेशी भाषा पढ़ाता है, तब भी छात्रों के लिए दो भारतीय भाषाएं पढ़ना अनिवार्य रहेगा।
छात्रों के लिए क्या बदलेगा?
अब तक अधिकतर स्कूलों में दो भाषाएं ही अनिवार्य थीं। नई नीति लागू होने के बाद छात्रों को एक अतिरिक्त भाषा सीखनी होगी। इससे पढ़ाई का दायरा बढ़ेगा, लेकिन साथ ही उन्हें नई भाषाओं और संस्कृतियों को समझने का अवसर भी मिलेगा।
सीबीएसई का मानना है कि बहुभाषी शिक्षा से बच्चों की सोच और अभिव्यक्ति क्षमता विकसित होगी और वे देश की विविधता को बेहतर ढंग से समझ पाएंगे।
कक्षा 10 तक जारी रह सकती है तीसरी भाषा
नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क की सिफारिश है कि तीनों भाषाओं की पढ़ाई कक्षा 9 और 10 तक जारी रहे। सूत्रों के अनुसार, भविष्य में कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा में भी तीसरी भाषा को शामिल किया जा सकता है। संभावना है कि 2031 की बोर्ड परीक्षा में छात्रों को तीसरी भाषा का पेपर देना पड़े।
नई किताबें और सिलेबस की तैयारी
इस बदलाव के साथ सीबीएसई नई किताबें और संशोधित सिलेबस तैयार करेगा। तीसरी भाषा में छात्रों को किस स्तर तक दक्ष बनाना है, इसके लिए अलग-अलग चरणों में पढ़ाई का ढांचा बनाया जा रहा है।
2026-27 सत्र से कक्षा 6 में तीसरी भाषा की पढ़ाई नौ भारतीय भाषाओं में शुरू करने की तैयारी है। इनमें तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, गुजराती और बांग्ला जैसी भाषाएं शामिल होंगी।
क्यों दिया जा रहा है तीसरी भाषा पर ज्यादा जोर?
नई संरचना में कक्षा 6 से 8 को ‘मिडिल स्टेज’ माना गया है। इसी दौरान तीसरी भाषा की शुरुआत होगी और छात्रों को इसे समझने, बोलने और लिखने के लिए पर्याप्त समय दिया जाएगा। सीबीएसई का कहना है कि कई छात्रों के लिए यह भाषा बिल्कुल नई हो सकती है, इसलिए अभ्यास और समय जरूरी है।
भाषा के जरिए संस्कृति से जुड़ाव
करिकुलम फ्रेमवर्क के अनुसार, भाषा केवल एक विषय नहीं, बल्कि संस्कृति और समाज से जुड़ने का माध्यम है। भारत की भाषाई विविधता इसकी ताकत है। जब छात्र एक से अधिक भारतीय भाषाएं सीखेंगे, तो वे देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे और उनमें एकता की भावना मजबूत होगी।
नई भाषा नीति को भारतीय शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है, जो आने वाले वर्षों में स्कूल शिक्षा की दिशा तय करेगा।










