लखनऊ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने मंगलवार को लखनऊ प्रवास के दौरान सामाजिक सद्भाव, जनसंख्या, घुसपैठ और यूजीसी गाइडलाइंस जैसे मुद्दों पर अपने विचार रखे।
निराला नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर के सभागार में आयोजित सामाजिक सद्भाव बैठक में उन्होंने कहा कि भारत में रहने वाले मुस्लिम भी इसी भूमि के हैं और वे बाहर से नहीं आए। उन्होंने ‘घर वापसी’ के प्रयासों को तेज करने की बात कही और जो लोग हिंदू धर्म में लौटें, उनके प्रति जिम्मेदारी निभाने पर जोर दिया।
घुसपैठ पर सख्त रुख
संघ प्रमुख ने देश में बढ़ती घुसपैठ पर चिंता जताते हुए कहा कि घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें हटाया और वापस भेजा जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ऐसे लोगों को रोजगार नहीं दिया जाना चाहिए।
जनसंख्या और विवाह पर टिप्पणी
हिंदू समाज की घटती जनसंख्या दर पर बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि औसतन कम से कम तीन बच्चे होने चाहिए। उनका तर्क था कि यदि किसी समाज में औसतन तीन से कम बच्चे होंगे तो भविष्य में उसका अस्तित्व संकट में पड़ सकता है। उन्होंने विवाह को केवल व्यक्तिगत इच्छा नहीं, बल्कि सृष्टि के विस्तार का माध्यम बताया।
जातिवाद और सामाजिक समरसता पर जोर
बैठक में उन्होंने जातिगत विभाजन पर चिंता जताई और कहा कि समाज को जातियों में बंटने से बचना होगा। उन्होंने कहा कि मुगल और अंग्रेजी शासन के लंबे दौर के बावजूद हिंदू संस्कृति को मिटाया नहीं जा सका।
भागवत ने कहा कि जातिगत विषमता दूर करना केवल सरकार या किसी संगठन का काम नहीं, बल्कि समाज के हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। उन्होंने समाज में अपनेपन की भावना बढ़ाने और सभी वर्गों के बीच समन्वय स्थापित करने पर जोर दिया।
UGC गाइडलाइंस पर क्या कहा
यूजीसी गाइडलाइंस को लेकर उन्होंने कहा कि कानून का पालन सभी को करना चाहिए। यदि किसी को कोई नियम गलत लगता है तो उसे संवैधानिक तरीके से बदलने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी कानून को लेकर समाज में टकराव नहीं होना चाहिए और समन्वय से समाधान निकाला जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि मामला यदि न्यायालय में है तो अंतिम निर्णय का सम्मान करना चाहिए।
अमेरिका-चीन का जिक्र
संघ प्रमुख ने कहा कि अमेरिका और चीन जैसे देशों में बैठे कुछ लोग भारत की सद्भावना के खिलाफ योजनाएं बना रहे हैं, इसलिए देशवासियों को सतर्क रहने की जरूरत है। उन्होंने आपसी विश्वास और एक-दूसरे के दुख-दर्द में सहभागी बनने पर जोर दिया।
दो दिवसीय लखनऊ प्रवास के दौरान मोहन भागवत ने करीब ढाई घंटे तक चली बैठक में विभिन्न वर्गों के लोगों से संवाद किया। उन्होंने कहा कि संघर्ष से नहीं, बल्कि समन्वय और सद्भाव से ही समाज और देश आगे बढ़ सकता है।










