पश्चिम बंगाल में पहले चरण के मतदान से ठीक 24 घंटे पहले Supreme Court of India ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच में कथित हस्तक्षेप और अधिकारियों के काम में बाधा डालने के आरोपों पर नाराजगी जताते हुए कहा कि कोई भी मुख्यमंत्री इस तरह जांच प्रक्रिया में दखल नहीं दे सकता।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा, “हम हकीकत से अपनी आंखें नहीं मूंद सकते” और यह मामला केवल केंद्र और राज्य सरकार के बीच का विवाद नहीं है। अदालत ने इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला जनवरी 2026 में हुई ED की छापेमारी से जुड़ा है। प्रवर्तन निदेशालय ने राजनीतिक रणनीतिकार संस्था I-PAC के कार्यालय और उसके संस्थापक प्रतीक जैन के घर पर रेड की थी। ED का आरोप है कि छापेमारी के दौरान ममता बनर्जी राज्य अधिकारियों के साथ मौके पर पहुंचीं और जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया। एजेंसी ने दावा किया कि वहां से कुछ दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी हटाए गए। हालांकि तृणमूल कांग्रेस ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है।
‘लोकतंत्र को खतरे में नहीं डाल सकते’
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि संविधान निर्माताओं ने कभी कल्पना नहीं की होगी कि कोई मौजूदा मुख्यमंत्री चलती जांच के दौरान दफ्तर में प्रवेश करेगा। अदालत ने कहा कि यदि केंद्रीय एजेंसियों को काम करने से रोका जाएगा तो इससे कानून व्यवस्था और लोकतंत्र दोनों प्रभावित होंगे।
न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने पर भी चिंता
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मालदा के कालियाचक की उस घटना का भी जिक्र किया, जिसमें मतदाता सूची विवाद के दौरान भीड़ ने कई न्यायिक अधिकारियों को घंटों तक बंधक बना लिया था। अदालत ने इसे “असाधारण स्थिति” बताते हुए कहा कि जब न्यायिक अधिकारी सुरक्षित नहीं हैं, तो यह बेहद गंभीर संकेत है।
चुनावी माहौल में बढ़ी सियासी गर्मी
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने बंगाल चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। विपक्ष इसे ममता सरकार पर बड़ा सवाल बता रहा है, जबकि तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है।









